Swami Avimukteshwaranand: उमाशंकर उपाध्याय से ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य बनने तक का सफर

Swami Avimukteshwaranand: उमाशंकर उपाध्याय से ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य बनने तक का सफर

छात्रसंघ चुनाव से शंकराचार्य तक: कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, प्रयागराज विवाद के बाद क्यों हैं चर्चा में?

प्रयागराज/प्रतापगढ़। प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर प्रशासन से हुए टकराव के बाद ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं। संगम घाट पर स्नान से रोके जाने के बाद वे अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए, जिसके चलते संत समाज, प्रशासन और राजनीति—तीनों स्तरों पर प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

यह विवाद केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सनातन परंपरा, प्रशासनिक नियमों और धार्मिक मर्यादा के सवालों से जुड़ गया। ऐसे में लोग जानना चाहते हैं कि आखिर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कौन हैं और उनका सफर कैसा रहा है।


स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का असली नाम और जन्म

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था।


उनका मूल नाम उमाशंकर पांडेय (उपाध्याय) है।
पिता का नाम पंडित राम सुमेर पांडेय और माता का नाम अनारा देवी बताया जाता है।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई।


बचपन में ही धर्म की ओर झुकाव

बताया जाता है कि महज 9 वर्ष की उम्र में उमाशंकर पांडेय गुजरात चले गए, जहां उन्होंने धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी रामचैतन्य के सानिध्य में गुरुकुल परंपरा के तहत संस्कृत शिक्षा ग्रहण करनी शुरू की।

इसी दौर से उनका जीवन पूरी तरह धर्म और शास्त्रों की साधना की ओर मुड़ गया।


फिर कभी गांव नहीं लौटे

परिजनों के अनुसार, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जब एक बार घर से निकले, उसके बाद कभी स्थायी रूप से गांव नहीं लौटे
हालांकि वे कई बार प्रतापगढ़ से होकर गुजरे, लेकिन घर नहीं गए।

उनके बड़े भाई गिरिजा शंकर पांडेय प्रसिद्ध कथावाचक हैं।
भतीजे जयराम पांडेय सहित परिवार के अन्य सदस्य भी भागवत कथा और रामकथा का वाचन करते हैं।


काशी में शिक्षा और छात्र राजनीति

उमाशंकर पांडेय ने वाराणसी के प्रतिष्ठित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से

  • शास्त्री

  • आचार्य

की उपाधि प्राप्त की।

इस दौरान उन्होंने
संस्कृत व्याकरण, वेद, पुराण, उपनिषद, वेदांत, आयुर्वेद और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया।

छात्रसंघ चुनाव में दबदबा

काशी में पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय रहे और
1994 में छात्रसंघ का चुनाव जीतकर अपनी मजबूत पहचान बनाई।
यही दौर उनके वैचारिक और नेतृत्व विकास का आधार बना।


स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से संपर्क

स्वामी करपात्री जी महाराज के निधन के बाद उमाशंकर पांडेय का संपर्क
ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुआ।

यहीं से उनका जीवन पूरी तरह सनातन धर्म की रक्षा और प्रचार के मार्ग पर अग्रसर हो गया।


दंड संन्यास और नाम परिवर्तन

15 अप्रैल 2003 को उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा दी गई।
इसी के साथ उमाशंकर पांडेय का नाम बदलकर
👉 स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती रखा गया।

संन्यास के बाद वे

  • गंगा संरक्षण

  • सनातन परंपराओं की रक्षा

  • धार्मिक अधिकारों के सवाल

पर मुखर रूप से सामने आए।


ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य कैसे बने

11 सितंबर 2022 को जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हुआ।
इसके अगले ही दिन, 12 सितंबर 2022 को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक हुआ और वे
👉 उत्तराखंड के जोशीमठ स्थित ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य बने।

हालांकि, इस नियुक्ति को लेकर

  • कुछ अखाड़ों ने आपत्ति जताई

  • कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई

  • मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा

उनके वकील टीएन मिश्रा के अनुसार, कोर्ट की पिछली कार्यवाही में उन्हें स्वयं “शंकराचार्य” संबोधित किया गया है।


प्रयागराज माघ मेला विवाद क्या है

17 जनवरी (मौनी अमावस्या) को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने काफिले के साथ
संगम स्नान के लिए पहुंचे थे।
प्रशासन ने पालकी/रथ के साथ आगे बढ़ने से रोक दिया, जिससे विवाद बढ़ गया।

धक्का-मुक्की की स्थिति बनी और
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठ गए
यह मामला अब
👉 धार्मिक परंपरा बनाम प्रशासनिक व्यवस्था
की बहस बन चुका है।

बेबाक बयान और लगातार सुर्खियां

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा, ज्ञानवापी, गंगा और प्रशासनिक फैसलों पर
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की बेबाक राय उन्हें अन्य संतों से अलग पहचान देती है।

समर्थक उन्हें सनातन परंपरा की आवाज मानते हैं,
जबकि आलोचक उनके तरीकों पर सवाल उठाते हैं।