मौत के बाद फिर जिंदा हुआ वैज्ञानिक! हैरान कर देने वाला अनुभव सुनकर दंग रह जाएंगे आप

मौत के बाद फिर जिंदा हुआ वैज्ञानिक! हैरान कर देने वाला अनुभव सुनकर दंग रह जाएंगे आप

मौत के बाद क्या होता है, यह सवाल सदियों से मानव जिज्ञासा का केंद्र रहा है। हाल ही में 40 साल से अधिक अनुभव वाले एक खगोल भौतिक विज्ञानी (Astrophysicist) ने दावा किया है कि 7 मिनट तक चिकित्सकीय रूप से मृत (Clinically Dead) रहने के दौरान उन्हें न तो कोई सुरंग दिखी और न ही सफेद रोशनी या फरिश्ते। उनके अनुसार, मौत के समय दिखने वाले दृश्य दिमाग द्वारा रची गई एक ‘सुखद कहानी’ हो सकते हैं।

वैज्ञानिक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Reddit पर अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि अचानक सांस लेने में तकलीफ के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनके फेफड़ों में रक्तस्राव (Lung Haemorrhage) पाया गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी नब्ज बंद हो गई। डॉक्टरों को उनका दिल दोबारा धड़काने में करीब 7 मिनट लगे। ऑक्सीजन की कमी के कारण उन्हें स्ट्रोक भी आया।

उन्होंने बताया कि उन सात मिनटों के दौरान उन्होंने काले शून्य में तीन अंडाकार आकृतियां देखीं। पहली आकृति में सुंदर पहाड़, जंगल और बादल नजर आए, जो धीरे-धीरे फीके पड़ गए। दूसरी आकृति एक जलती हुई लोहे की अंगूठी जैसी थी, जिससे टुकड़े गिरते प्रतीत हो रहे थे और उन्हें धात्विक गंध का अहसास हुआ। तीसरी आकृति तब दिखाई दी जब उनका दिल दोबारा धड़कने लगा, जिसमें गुलाबी और नीले रंग के बादल तैरते दिखे।

वैज्ञानिक के अनुसार, मरने से ठीक पहले वे जर्मन खगोलशास्त्री जोहान्स केपलर के कार्यों और ग्रहों की अंडाकार कक्षाओं का अध्ययन कर रहे थे। उनका मानना है कि दिमाग ने उन्हीं हालिया विचारों को आधार बनाकर अंतिम क्षणों में दृश्य रचे। उनका कहना है, “मौत उस समय आपके दिमाग में सबसे सुलभ विचारों को प्रतिबिंबित करती है। दिमाग आपको एक कहानी सुनाता है ताकि मरना आसान हो सके।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरंग, सफेद रोशनी या मृत रिश्तेदारों से मुलाकात जैसी बातें संभवतः मस्तिष्क की रचना हैं। इस अनुभव के बाद उनके मन से मौत का भय पूरी तरह समाप्त हो गया है। उन्होंने खुद को उन क्षणों में एक निष्पक्ष पर्यवेक्षक की तरह महसूस किया, जिसमें न डर था और न लालच।

यह अनुभव तथाकथित एनडीई (Near Death Experience) पर नई वैज्ञानिक बहस को जन्म देता है। वैज्ञानिक का तर्क है कि ऐसे अनुभव व्यक्ति की सांस्कृतिक धारणाओं, आस्थाओं और हालिया मानसिक गतिविधियों से प्रभावित हो सकते हैं, जो आध्यात्मिक व्याख्याओं को चुनौती देते हैं।