दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी Google ने हाल ही में एक नई एआई तकनीक Groundsource AI लॉन्च की है। इस तकनीक का उद्देश्य शहरों में अचानक आने वाली बाढ़ यानी फ्लैश फ्लड की पहले से भविष्यवाणी करना है। कंपनी का दावा है कि इस तकनीक की मदद से शहरी क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड का अंदाजा करीब 24 घंटे पहले लगाया जा सकेगा, जिससे लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने और सतर्क होने का समय मिल सकेगा।
World Meteorological Organization (WMO) के अनुसार दुनिया भर में बाढ़ से होने वाली लगभग 85% मौतें फ्लैश फ्लड के कारण होती हैं। यह बाढ़ बहुत तेजी से आती है और कई बार तेज बारिश के कुछ ही घंटों के भीतर सड़कों और गलियों को तेज बहाव वाली नदी में बदल देती है। ऐसी घटनाओं में हर साल करीब 5,000 से अधिक लोगों की जान चली जाती है, इसलिए समय पर चेतावनी देना बेहद जरूरी माना जाता है।
गूगल के अनुसार फ्लैश फ्लड की सटीक भविष्यवाणी करना पहले मुश्किल था, क्योंकि इससे जुड़ा उच्च गुणवत्ता वाला डेटा उपलब्ध नहीं था। इस समस्या को हल करने के लिए कंपनी ने Groundsource AI सिस्टम तैयार किया है, जो इंटरनेट और सार्वजनिक स्रोतों में मौजूद रिपोर्ट्स को इकट्ठा करके उन्हें व्यवस्थित डेटा में बदल देता है।
इस तकनीक में Gemini एआई मॉडल का उपयोग किया गया है। इस मॉडल ने साल 2000 के बाद से दुनिया भर की सार्वजनिक रिपोर्ट्स का विश्लेषण कर 150 से अधिक देशों में 26 लाख से ज्यादा बाढ़ की घटनाओं की पहचान की। इसके बाद Google Maps की मदद से इन घटनाओं के सटीक भौगोलिक स्थान को चिन्हित किया गया, जिससे एक बड़ा और भरोसेमंद डेटासेट तैयार हुआ।
इस डेटा के आधार पर गूगल ने एक नया मॉडल विकसित किया है, जो शहरी क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड की भविष्यवाणी पहले की तुलना में अधिक सटीक तरीके से कर सकता है। यह सुविधा अब Google Flood Hub पर उपलब्ध है, जहां पहले से नदी से जुड़ी बाढ़ की भविष्यवाणी की जानकारी दी जाती रही है।
Sundar Pichai ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि Groundsource तकनीक फ्लैश फ्लड से जुड़ी जानकारी की कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि इस डेटासेट को ओपन सोर्स किया जा रहा है, ताकि दुनियाभर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता इसका उपयोग कर सकें।
गूगल का मानना है कि भविष्य में इस एआई सिस्टम का इस्तेमाल भूस्खलन, हीटवेव और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की भविष्यवाणी के लिए भी किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह तकनीक आपदा प्रबंधन और लोगों की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।