बढ़ती गैस कीमतों के बीच भारत की नई ऊर्जा रणनीति
नई दिल्ली/पुणे। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति में अस्थिरता और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते रसोई गैस (LPG) की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसी चुनौती के बीच भारत में वैज्ञानिक एक वैकल्पिक ईंधन के रूप में डाइमिथाइल ईथर (DME) पर तेजी से काम कर रहे हैं, जिसे भविष्य में LPG के विकल्प के तौर पर उपयोग किया जा सकता है।
पुणे स्थित CSIR-नेशनल केमिकल लैबोरेटरी (CSIR-NCL) ने DME के उत्पादन के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ईंधन न केवल LPG पर निर्भरता कम कर सकता है, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत बना सकता है।
क्या है DME और क्यों है खास?
डाइमिथाइल ईथर एक सिंथेटिक गैस है, जिसे मुख्य रूप से मेथनॉल से तैयार किया जाता है। मेथनॉल का उत्पादन बायोमास, कोयला या कैप्चर किए गए कार्बन डाइऑक्साइड से संभव है। यह रंगहीन गैस गुणों के मामले में LPG से काफी हद तक मिलती-जुलती है, इसलिए इसे घरेलू ईंधन के रूप में उपयोग करने की संभावनाएं मजबूत मानी जा रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, DME साफ तरीके से जलने वाला ईंधन है, जो पारंपरिक ईंधनों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाता है। इससे निकलने वाले कण, नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), सल्फर ऑक्साइड (SOx) और अन्य हानिकारक उत्सर्जन काफी कम होते हैं, जबकि इसकी ऊर्जा दक्षता LPG के समान मानी जाती है।
LPG के साथ कैसे होगा इस्तेमाल?
DME की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसे उपयोग में लाने के लिए मौजूदा घरेलू गैस ढांचे—जैसे सिलेंडर, रेगुलेटर, पाइप और बर्नर—में बड़े बदलाव की आवश्यकता नहीं होगी। यही कारण है कि इसे तेजी से अपनाने की संभावना जताई जा रही है।
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने भी LPG में DME मिलाने के लिए मानक तय कर दिए हैं। IS 18698:2024 के अनुसार, घरेलू, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपयोग के लिए LPG में 20 प्रतिशत तक DME मिलाया जा सकता है। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि लगभग 8 प्रतिशत तक मिश्रण बिना किसी तकनीकी बदलाव के आसानी से संभव है।
आर्थिक और रणनीतिक फायदे
भारत दुनिया के सबसे बड़े LPG उपभोक्ताओं में शामिल है और इसकी बड़ी मात्रा आयात करनी पड़ती है। वर्ष 2024 में देश ने करीब 21 मिलियन टन LPG आयात किया था। ऐसे में DME के उपयोग से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि LPG के सिर्फ 8 प्रतिशत हिस्से को DME से प्रतिस्थापित किया जाए, तो भारत हर साल लगभग ₹9,500 करोड़ की विदेशी मुद्रा बचा सकता है। उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों उपभोक्ताओं को ध्यान में रखते हुए इसके लिए प्रतिदिन करीब 1,300 टन DME उत्पादन क्षमता की आवश्यकता होगी।
अन्य क्षेत्रों में भी उपयोग
DME का उपयोग केवल रसोई गैस तक सीमित नहीं है। इसे ऑटोमोबाइल ईंधन के रूप में भी अपनाया जा सकता है। इसके अलावा, यह एयरोसोल उत्पादों में प्रोपेलेंट के रूप में इस्तेमाल हो सकता है, जहां यह ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले CFCs का विकल्प बन सकता है। साथ ही, यह रासायनिक उद्योग में विभिन्न उत्पादों के निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण मध्यवर्ती (intermediate) के रूप में भी काम करता है।
जल्द शुरू हो सकता कमर्शियल उत्पादन
CSIR-NCL अब इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर तक ले जाने की तैयारी में है। संस्थान एक इंजीनियरिंग पार्टनर के साथ मिलकर अगले 6 से 9 महीनों में प्रतिदिन 2.5 टन उत्पादन क्षमता वाले एक डेमो प्लांट स्थापित करने की योजना बना रहा है।
यह डेमो प्लांट भविष्य में 500 से 1000 टन प्रतिदिन क्षमता वाले बड़े वाणिज्यिक संयंत्रों के लिए आधार तैयार करेगा। संस्थान के निदेशक डॉ. आशीष लेले के अनुसार, बड़े तेल सार्वजनिक उपक्रमों और बायोएनर्जी कंपनियों के साथ साझेदारी कर इस तकनीक को व्यापक स्तर पर लागू करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
क्यों बढ़ी DME की जरूरत?
वैश्विक ऊर्जा मार्गों में व्यवधान और भू-राजनीतिक तनाव—जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में स्थिति—ने वैकल्पिक ईंधनों की आवश्यकता को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। ऐसे में DME को एक रणनीतिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जो न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि देश को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी मददगार साबित हो सकता है।
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