देहरादून। केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी मिशन योजना के तहत देहरादून में चल रही स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि बिना टेंडर के 2.93 करोड़ रुपये के कार्य कराए गए और तय समय पर काम पूरा न करने के बावजूद कार्यदायी संस्था से 19 करोड़ रुपये की वसूली नहीं की गई।
रिपोर्ट के अनुसार 5.91 करोड़ रुपये की लागत से देहरादून के तीन सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर लैब, इंटरेक्टिव बोर्ड, प्रोजेक्टर, ई-कंटेंट, सीसीटीवी और बायोमीट्रिक मशीनें लगाई गईं, लेकिन उन्हें शुरू ही नहीं किया गया। देहरादून का चयन वर्ष 2017 में स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए किया गया था और कैग ने 2018 से 2023 तक किए गए कार्यों का ऑडिट किया। परियोजना के काम जून 2023 तक पूरे होने थे, लेकिन समयसीमा बढ़ाकर 2024 कर दी गई।
परियोजना के लिए कुल 1000 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया था। वर्ष 2016 से 2023 के बीच 737 करोड़ रुपये जारी हुए, जिनमें से 634.11 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस परियोजना का क्रियान्वयन देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड (डीएससीएल) को सौंपा गया था।
कैग ने स्मार्ट सिटी की 22 परियोजनाओं का ऑडिट किया। रिपोर्ट में बताया गया कि दून कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के तहत ठोस कचरा प्रबंधन की निगरानी के लिए मार्च 2022 में विकसित बायोमीट्रिक और सेंसर प्रणाली फरवरी 2025 तक लागू नहीं की गई, जिससे 4.55 करोड़ रुपये का खर्च बेकार चला गया। स्मार्ट अपशिष्ट वाहन योजना के तहत 90 लाख रुपये में खरीदे गए ई-रिक्शा भी दो साल तक संचालित नहीं हुए।
इसके अलावा शहर में मौसम संबंधी जानकारी देने के लिए लगाए गए पर्यावरण सेंसरों पर 2.62 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि मल्टी यूटिलिटी डक्ट पर 3.24 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन इनका उपयोग नहीं हो पाया। परियोजना प्रबंधन सलाहकार को अधूरी परियोजना के बावजूद भुगतान किया गया, जिसमें 5.19 करोड़ रुपये की अनियमितता पाई गई।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि आठ परियोजनाओं में कार्य स्थल उपलब्ध न होने के कारण 38 महीने तक देरी हुई, लेकिन ठेकेदारों पर 1.41 करोड़ रुपये का दंड नहीं लगाया गया। गलत वित्तीय प्रबंधन के कारण 6.20 करोड़ रुपये के ब्याज का नुकसान भी हुआ।
स्मार्ट पोल परियोजना के तहत शहर में 130 स्मार्ट पोल और 100 किमी ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाने का लक्ष्य था, लेकिन 2023 तक केवल 27 स्मार्ट पोल और 70 किमी ओएफसी ही बिछाई जा सकी।
प्रदूषण कम करने के लिए शुरू की गई 41.56 करोड़ रुपये की इलेक्ट्रिक बस परियोजना में भी घाटा सामने आया है। वर्ष 2020 में 30 ई-बसों का संचालन शुरू किया गया था, लेकिन मार्च 2023 तक इस योजना में 11.26 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। योजना में जहां प्रतिदिन 3.93 लाख रुपये राजस्व का अनुमान था, वहीं वास्तविक आय केवल 1.29 लाख रुपये प्रतिदिन रही।