गोरखपुर। स्वच्छ भारत मिशन (अर्बन) के तहत गोरखपुर नगर निगम ने वर्षों पुराने लेगेसी वेस्ट डंपसाइट को वैज्ञानिक तरीके से समाप्त कर 40 एकड़ क्षेत्र में आधुनिक ‘राप्ती ईको पार्क’ विकसित किया है। कभी दुर्गंध, प्रदूषण और कचरे के पहाड़ के लिए बदनाम यह क्षेत्र अब हरियाली, स्वच्छ वातावरण और सामुदायिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया है। यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और सतत शहरी विकास का प्रेरक उदाहरण बनकर उभरी है।
दरअसल, यह डंपसाइट करीब सात वर्षों तक शहर के ठोस कचरे का प्रमुख निस्तारण स्थल रही। समय के साथ यहां लाखों टन कचरा जमा हो गया, जिससे आसपास के लोगों को दुर्गंध, धुएं, मच्छरों, लीचेट रिसाव और वायु व भूजल प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। बारिश के दौरान दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता था और क्षेत्र की पर्यावरणीय स्थिति लगातार बिगड़ रही थी।
समस्या के स्थायी समाधान के लिए गोरखपुर नगर निगम ने बायोमाइनिंग तकनीक का सहारा लिया। लगभग 8 ट्रॉमल मशीनों, जेसीबी मशीनों और करीब 25 कर्मियों की मदद से प्रतिदिन लगभग 400 टन कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण किया गया। इस दौरान कचरे को रिफ्यूज डिराइव्ड फ्यूल (RDF), ब्लैक सॉइल, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री और इनर्ट पदार्थों में अलग किया गया। ब्लैक सॉइल का उपयोग निम्न क्षेत्रों की भराई में किया गया, जबकि RDF को सीमेंट उद्योग में उपयोग के लिए भेजा गया। इस प्रक्रिया से लैंडफिल पर निर्भरता कम होने के साथ-साथ अपशिष्ट का बेहतर उपयोग भी सुनिश्चित हुआ।
नगर निगम के अनुसार, इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से 40 एकड़ भूमि को दोबारा उपयोग के योग्य बनाया गया। इससे मीथेन गैस के उत्सर्जन में कमी आई और क्षेत्र की वायु, मिट्टी तथा भूजल की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ। भूमि पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया, जिससे जैव विविधता को भी बढ़ावा मिला। अब यहां तितलियों, मधुमक्खियों और विभिन्न वनस्पतियों की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है।
डंपसाइट के स्थान पर विकसित ‘कचरे से कंचन राप्ती ईको पार्क’ को जनहित और पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। पार्क में ग्रीन लॉन, वॉकिंग और जॉगिंग ट्रैक, बच्चों के लिए किड्स ज़ोन, ओपन जिम, योग एवं मेडिटेशन क्षेत्र, सेल्फी प्वाइंट, जल संरक्षण संरचनाएं, सोलर लाइटिंग, फूड कोर्ट, पार्किंग और आधुनिक सार्वजनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं। विशेष बात यह है कि पार्क में स्थापित कई कलात्मक संरचनाएं नगर निगम के अपशिष्ट पदार्थों से तैयार की गई हैं, जो ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा को साकार करती हैं।
महिला स्वयं सहायता समूह ‘शक्ति की रसोई’ को पार्क के रेस्टोरेंट के संचालन की जिम्मेदारी दी गई है, जिससे स्थानीय महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिले हैं। वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 500 लोग सुबह-शाम पार्क में सैर, व्यायाम और मनोरंजन के लिए पहुंच रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जहां कचरे के कारण जीवन मुश्किल था, वहीं अब यह स्थान परिवारों, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए पसंदीदा सार्वजनिक स्थल बन गया है।
नगर निगम का कहना है कि परियोजना का संचालन स्वयं सहायता समूहों के सहयोग से किया जा रहा है। पार्क बनने के बाद आसपास के क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है। यह परियोजना स्वच्छ भारत मिशन (अर्बन) के उस लक्ष्य को साकार करती है, जिसके तहत लेगेसी वेस्ट का वैज्ञानिक निस्तारण कर शहरों को स्वच्छ, हरित और टिकाऊ बनाया जा रहा है।