हल्द्वानी, 31 जुलाई। एम बी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हल्द्वानी के हिंदी विभाग द्वारा कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर “प्रेमचंद होने के मायने” विषय पर एक राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. नरेंद्र सिंह बनकोटी ने की।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. बनकोटी ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना और लोकतांत्रिक मूल्यों का सशक्त वाहक है। उन्होंने प्रेमचंद की साहित्य-दृष्टि को समकालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ते हुए उनके विचारों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ताओं डॉ० दिनेश कर्नाटक, डॉ० हेमचंद दुबे, डॉ० आशा हरबोला तथा डॉ० विपिन कुमार ने प्रेमचंद के साहित्य, उनके मानवीय सरोकारों तथा भारतीय समाज में उनके योगदान पर विस्तृत एवं विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने कहा कि प्रेमचंद केवल हिंदी कथा-साहित्य के शिखर पुरुष ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के नैतिक विवेक और मानवीय चेतना के अमर हस्ताक्षर हैं। उनके साहित्य में सामाजिक विषमताओं, शोषित वर्गों की पीड़ा, समानता, न्याय और मानवीय मूल्यों का सशक्त चित्रण मिलता है।
संगोष्ठी में प्रेमचंद के ऐतिहासिक भाषण “साहित्य का उद्देश्य” के महत्वपूर्ण विचारों का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं ने विशेष रूप से उनके प्रसिद्ध कथन— “साहित्य जीवन की आलोचना है।”—को वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए कहा कि साहित्य का वास्तविक उद्देश्य समाज को जागरूक, संवेदनशील और मानवीय बनाना है।
देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े विद्वानों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं साहित्य प्रेमियों ने बड़ी संख्या में ऑनलाइन सहभागिता कर संगोष्ठी को ज्ञानवर्धक एवं संवादपरक बनाया। प्रतिभागियों ने विचार-विमर्श के माध्यम से प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत और उनके मानवीय मूल्यों पर सार्थक चर्चा की।
कार्यक्रम के अंत में आयोजन समिति की ओर से आभार ज्ञापित करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों तथा हिंदी विभाग के समस्त सदस्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई। इस अवसर पर यह विश्वास व्यक्त किया गया कि प्रेमचंद के साहित्य में निहित मानवीय मूल्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोकमंगल की भावना आज भी समाज को नई दिशा प्रदान करने में सक्षम हैं।
यह संगोष्ठी प्रेमचंद के साहित्यिक अवदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने तथा उनके विचारों की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं सार्थक पहल सिद्ध हुई। संगोष्ठी का संचालन डॉ० अमिता प्रकाश ने तथा आभार डॉ० विक्रम सिंह राठौर ने सभी अतिथियों और वक्ताओं का आभार प्रकट किया इस संगोठी में हिंदी विभाग और अन्य महाविद्यालयों के प्राध्यापकों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने बढ़ चढ़कर ऑनलाइन माध्यम से प्रतिभाग किया| कार्यक्रम में डॉ० जगदीश चन्द्र जोशी, संध्या गड़कोटी, डॉ० रेनू जोशी, डॉ० सुमिता गड़कोटी, डॉ०. जयश्री भंडारी, और हिंदी विभाग के समस्त शोधार्थी उपस्थित रहे।