देहरादून। उत्तराखंड में डेंगू के मामलों के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने नई चिंता जताई है। विशेषज्ञों के अनुसार, अब डेंगू वायरस का क्लीनिकल पैटर्न बदल रहा है और मरीजों में पहले चरण में ही गंभीर लक्षण दिखाई देने लगे हैं। पहले जहां डेंगू शॉक सिंड्रोम (DSS) के लक्षण बीमारी के दूसरे चरण में सामने आते थे, वहीं अब कई मरीज शुरुआती दिनों में ही गंभीर स्थिति में पहुंच रहे हैं।
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विजय भंडारी और वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. कुमार जी कौल के अनुसार, डेंगू संक्रमण सामान्यतः तीन चरणों में विकसित होता है।
पहले चरण (2 से 7 दिन) में मरीज को तेज बुखार, उल्टी, सिरदर्द और शरीर में दर्द की शिकायत होती है। दूसरे चरण (7 से 14 दिन) में डेंगू शॉक सिंड्रोम विकसित हो सकता है, जिसमें प्लेटलेट्स तेजी से कम होने लगती हैं और शरीर में प्लाज्मा लीक होने के कारण मरीज की स्थिति गंभीर हो सकती है। तीसरा चरण रिकवरी का होता है।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि अब कई मरीजों में पहले चरण में ही आंतरिक रक्तस्राव (ब्लीडिंग) शुरू हो रहा है। इसके कारण फेफड़ों और छाती में पानी भरने जैसी गंभीर स्थिति बन सकती है, जिससे सांस लेने में परेशानी होती है और मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है।
डॉ. कुमार जी कौल के मुताबिक, डेंगू वायरस के चार अलग-अलग स्ट्रेन होते हैं। यदि किसी व्यक्ति को एक से अधिक स्ट्रेन वाले संक्रमित मच्छर काट लें, तो बीमारी अधिक गंभीर रूप ले सकती है और डेंगू शॉक सिंड्रोम के लक्षण जल्दी विकसित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि तेज बुखार, लगातार उल्टी, सांस लेने में तकलीफ, अत्यधिक कमजोरी या ब्लीडिंग जैसे लक्षण दिखाई देने पर देरी न करें और तुरंत एलाइजा (ELISA) जांच सहित आवश्यक चिकित्सकीय परीक्षण कराएं। समय पर जांच और उपचार से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।