उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल Bhagat Singh Koshyari को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। शिक्षा, सामाजिक सेवा और सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक दिए गए उनके योगदान को देखते हुए केंद्र सरकार ने उन्हें इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना।
उत्तराखंड में ‘भगत दा’ के नाम से लोकप्रिय भगत सिंह कोश्यारी का जन्म 17 जून 1942 को बागेश्वर जिले के दूरस्थ गांव पलानधुरा में हुआ था। साधारण ग्रामीण परिवेश से आने के बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने उत्तर प्रदेश में अध्यापन कार्य से की, लेकिन बाद में स्वयं को पूरी तरह शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
उन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर और विवेकानंद इंटर कॉलेज जैसे शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही उत्तरांचल उत्थान परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान दिया। सामाजिक चेतना को मजबूत करने के उद्देश्य से उन्होंने हिंदी साप्ताहिक ‘पर्वत पीयूष’ का संपादन और प्रकाशन भी शुरू किया।
राजनीतिक जीवन में भी भगत सिंह कोश्यारी का लंबा और सक्रिय सफर रहा। वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य, उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, राज्यसभा सांसद, लोकसभा सांसद और बाद में महाराष्ट्र के राज्यपाल भी रहे। ऊर्जा मंत्री के रूप में उन्होंने टिहरी जल विद्युत परियोजना समेत कई अहम विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई।
आपातकाल के दौरान उन्हें मीसा (MISA) के तहत जेल भी जाना पड़ा था। इसके अलावा उन्होंने ‘उत्तरांचल प्रदेश क्यों’ और ‘उत्तरांचल प्रदेश: संघर्ष एवं समाधान’ जैसी चर्चित पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें उत्तराखंड राज्य आंदोलन और विकास की उनकी सोच स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
पद्म भूषण सम्मान मिलने के बाद उत्तराखंड समेत देशभर में उनके समर्थकों और शुभचिंतकों में खुशी का माहौल है।