देहरादून, 14 अक्टूबर। उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न होने वाली संभावित बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) के खतरे की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण पहल की गई है। चमोली जिले के वसुंधरा ताल में राज्य की पहली ग्लेशियल झील पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है। उच्च हिमालयी क्षेत्र की दुर्गम परिस्थितियों में वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल ने विभिन्न आधुनिक सेंसर और उपग्रह संचार प्रणाली स्थापित करने का अभियान पूरा कर लिया है।
यूएसडीएमए में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने अभियान से लौटे दल का स्वागत किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रणाली की स्थापना के प्रथम चरण की सफलता पर प्रसन्नता जताते हुए कहा कि ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना पर्वतीय राज्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और संस्थागत समन्वय के जरिए आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया।
मौसम, जलस्तर और बर्फ की स्थिति पर रहेगी नजर
वसुंधरा ताल में स्थापित प्रणाली के तहत हवा की गति और दिशा, वर्षा, तापमान, वायुदाब, सौर विकिरण और झील के जलस्तर की निगरानी की जाएगी। इसके अलावा बर्फ की गहराई, बर्फ की सतह के नीचे अलग-अलग स्तरों पर तापमान और झील की सतह के तापमान को मापने के लिए भी सेंसर लगाए गए हैं।
संभावित बाढ़ से जुड़े कंपन, झुकाव और भू-गतिविधियों में बदलाव की निगरानी के लिए एक्सेलेरोमीटर और टिल्ट सेंसर स्थापित किए गए हैं। हिमस्खलन से संबंधित गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भी अतिरिक्त सेंसर लगाए गए हैं। इन उपकरणों से मिलने वाले आंकड़े झील और आसपास के क्षेत्र में होने वाले बदलावों को समझने में मदद करेंगे।
हर दो घंटे में भेजे जाएंगे आंकड़े
सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) ने राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत यह अभियान संचालित किया। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सामान्य परिस्थितियों में सेंसर हर दो घंटे में आंकड़े सीबीआरआई और यूएसडीएमए के डैशबोर्ड पर भेजेंगे। आपातकालीन स्थिति में निर्धारित अंतराल की प्रतीक्षा किए बिना तत्काल आंकड़े भेजे जा सकेंगे। क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण डेटा संचार के लिए इरिडियम उपग्रह तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। अभियान दल ने डेटा संचार प्रणाली का परीक्षण भी किया है।
सौर ऊर्जा से चलेगी प्रणाली
दुर्गम क्षेत्र में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सौर पैनल और बैटरी लगाई गई है। अधिकारियों के अनुसार, 280 एम्पीयर क्षमता वाली बैटरी सौर पैनल को पर्याप्त धूप नहीं मिलने की स्थिति में लगभग 10 दिन तक बैकअप दे सकती है।
अभियान दल के प्रमुख और सीबीआरआई रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो ने बताया कि वसुंधरा ताल की गहराई लगभग 38.50 मीटर, चौड़ाई 600 मीटर और लंबाई 900 मीटर है। उनके अनुसार, उपलब्ध पुराने और मौजूदा आंकड़ों की तुलना में झील के आकार में कोई विशेष बदलाव नहीं मिला है। उपकरणों की स्थापना के लिए स्टील के मॉड्यूलर डिजाइन वाला फाउंडेशन बनाया गया है, जिसमें सीमेंट के बजाय स्थानीय पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इसका डिजाइन 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक की हवा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक और मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने भी इस पहल को आपदा पूर्व तैयारी मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। अभियान में एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और आईटीबीपी ने सहयोग दिया।